सुबह कई बार खुद नहीं आती
सुबह कई बार पैदा की जाती
खुद सूरज को धकेल कई बार सूरज को लुडकाया जाता
तभी उसे पहाड़ों से धकेल धकेल किसी तरह सुबह उगाया जाता
चाँद को किसी तरह समझा बुझा कर, तारों को घुट्टी पिलाकर
उन्हे किसी तरह सुलाया जाता
क्यूंकि सुबह कई बार खुद नहीं आती है
सुबह किसी तरह कई आंसू रोने के बाद पैदा की जाती है
आज मैने एक नई सुबह खुद ही बना डाली
खुद ही को हार मैने किसी अपने को जीत दिला ही डाली
Wednesday, January 6, 2010
Thursday, December 10, 2009
आस्तीन का यार
नश्तर घोंप गया मेरा अपना मेरे ही मज़ार पर
मैं तो समझा था इब्तेदा करने आया था
दरिया समंदर खूब पिए, आज अपने को ही पी रहा हूँ
आज खुद का क़त्ल कर में फिर एक बार जी रहा हूँ
वो मुझसे गले मिलता रहा और पीठ में खंजर बोता रहा
मैं समझता रहा की वो मेरी पीठ सहला रहा था
मैं समझता रहा की वो करीब आ रहा था
मुझे क्या पता था वो मुझसे दूर जा रहा था
गम ये नहीं, की दुआ सलाम भी न की
गम ये है की वो मेरा बनकर भी गीत किसी और का गा रहा था
एक एक ईंट जोड़ कर बनाया था जो घर
वो उसी में मेरा अपना बन सेंध लगा रहा था
मैं समझा हवा के आने का रास्ता बना रहा होगा
पर वो तो मेरी धूप चुरा रहा था
एक एक टुकड़ा जोड़ कर जैसा बनाया था हमने उसे
उसको हथियाने के लिए बोली कोई और लगा रहा था
हम तो ठहरे जिंदादिल बादशाह
पर वो महलों से हट बस्ती बसा रहा था
देखो कैसे यारों मेरा यार ही मुझे नीलाम करा रहा था
मैं तो समझा था इब्तेदा करने आया था
दरिया समंदर खूब पिए, आज अपने को ही पी रहा हूँ
आज खुद का क़त्ल कर में फिर एक बार जी रहा हूँ
वो मुझसे गले मिलता रहा और पीठ में खंजर बोता रहा
मैं समझता रहा की वो मेरी पीठ सहला रहा था
मैं समझता रहा की वो करीब आ रहा था
मुझे क्या पता था वो मुझसे दूर जा रहा था
गम ये नहीं, की दुआ सलाम भी न की
गम ये है की वो मेरा बनकर भी गीत किसी और का गा रहा था
एक एक ईंट जोड़ कर बनाया था जो घर
वो उसी में मेरा अपना बन सेंध लगा रहा था
मैं समझा हवा के आने का रास्ता बना रहा होगा
पर वो तो मेरी धूप चुरा रहा था
एक एक टुकड़ा जोड़ कर जैसा बनाया था हमने उसे
उसको हथियाने के लिए बोली कोई और लगा रहा था
हम तो ठहरे जिंदादिल बादशाह
पर वो महलों से हट बस्ती बसा रहा था
देखो कैसे यारों मेरा यार ही मुझे नीलाम करा रहा था
Saturday, November 28, 2009
शून्य की विडम्बना
शून्य की विडम्बना सिर्फ एक शुन्य ही समझ सकता है
हास्य का पात्र बन कर जीने की कला सिर्फ शुन्य ही जानता है
हर एक को अपने से नहीं जोड़ पाता, किसी से जुड़ता है तो दे जाता है
एक शून्य ही शून्य का दर्द जानता है
अपने ही महत्व को न जान पाता है, सब कुछ खोकर भी पा जाता है
एक शून्य की विडम्बना को सिर्फ एक शून्य ही जान पाता है
हास्य का पात्र बन कर जीने की कला सिर्फ शुन्य ही जानता है
हर एक को अपने से नहीं जोड़ पाता, किसी से जुड़ता है तो दे जाता है
एक शून्य ही शून्य का दर्द जानता है
अपने ही महत्व को न जान पाता है, सब कुछ खोकर भी पा जाता है
एक शून्य की विडम्बना को सिर्फ एक शून्य ही जान पाता है
Friday, November 27, 2009
उस वक़्त
मेरा जूनून बोतल में बंद जिन्न नहीं
मेरा जूनून शराब की चुस्की के बाद निकली हुंकार नहीं
हज़ारों मोमबतियां जला लो, दुःख मना लो
में तो तभी जलूँगा जब ये सब बुझ जाएँगी
क्यूंकि किसी को तो जलना ही होगा सब बुझने के बाद
मैं कागज़ का चीता नहीं, दूर खड़ा लोमड हूँ
तुम्हारी बची हुई जूठन को भी तो किसी को खाना होगा
किसी को तो ये संसार बचाना होगा
तुम भाषण सुनो, काली पट्टियां पहनों
मैं बस तुम्हे देखता सुनता रहूँगा
मैं तब बोलूँगा जब तुम गूंगे बन जाओगे
क्यूंकि कोई तो आवाज़ उठाने वाला चाहिए होगा उस वक़्त
तुम आपदा का इंतज़ार करो
मैं तब तक कुछ दीवारें और मजबूत कर लूँ
क्यूंकि कोई तो बचा रहना चाहिए उस वक़्त.
मेरा जूनून शराब की चुस्की के बाद निकली हुंकार नहीं
हज़ारों मोमबतियां जला लो, दुःख मना लो
में तो तभी जलूँगा जब ये सब बुझ जाएँगी
क्यूंकि किसी को तो जलना ही होगा सब बुझने के बाद
मैं कागज़ का चीता नहीं, दूर खड़ा लोमड हूँ
तुम्हारी बची हुई जूठन को भी तो किसी को खाना होगा
किसी को तो ये संसार बचाना होगा
तुम भाषण सुनो, काली पट्टियां पहनों
मैं बस तुम्हे देखता सुनता रहूँगा
मैं तब बोलूँगा जब तुम गूंगे बन जाओगे
क्यूंकि कोई तो आवाज़ उठाने वाला चाहिए होगा उस वक़्त
तुम आपदा का इंतज़ार करो
मैं तब तक कुछ दीवारें और मजबूत कर लूँ
क्यूंकि कोई तो बचा रहना चाहिए उस वक़्त.
Wednesday, October 28, 2009
त्रिवेणी
हम तो साँसे लेने को उतारू हैं
पर वो ही हमें छोड़ चली जाती हैं
क्या हमारे हिस्से में इतनी हवा भी नहीं ?
रोज गूंथता हूँ अपने सपने
पर बडे नमकीन हो चले हैं
मालूम न था आंसुओं में इतना नमक होता है
सोचा था दरिया ऊपर ओढूँ लूँगा
मगर वो भी छलक गया
सर्द हुआ मौसम बहुत
मुआ सूरज भी तो जम गया
राख छानता हूँ कुछ कंकड़ बीनने हैं
उसको मारने का कोई तो हथियार हो
हर तरफ आग लगी है
अब तो आँखों से भी छिड़कने को कुछ न बचा
आते हो और चले जाते हो
सांकल तो खडका दिया करो
थोडी ही सही, कुछ तो खामोशी टूटेगी
कल सूरज मेरे घर चंदा मांगने आया
बोला कुछ आग दे दो, बहुत तंगी है
मैने अपनी हिस्से का दिल तोड़ कर दे दिया
अब तेरे वाले हिस्से से ही जी रहा हूँ
देखना कल कमबख्त दुनिया फूँक डालेगा
सामने से आया और बगल से ही खामोश निकल गया
चलो इतना तो अदब दिखाया की अपनी खुशबू छोड़ गया
इन्ही सड़कों पर तो चले थे साथ हम कभी
अब ये सड़कें तंग हुई तो सड़कों का क्या कसूर ?
रात आई, मेरे चेहरे पर कुछ ठंडी बूँदें गिरा गई
जब आंख खुली तो गर्म आंसू थे गालों पर
कमबख्त को रोना भी ढंग से नहीं आता
भला आंसू भी कभी ठंडे होते हैं?
जिन्दा डूबा तो कैसे?
मुर्दा तैरा तो कैसे ?
क्या सांसें ही इतनी भारी थीं ?
मरते की आंखें अब बंद क्यूँ करते हो
क्या डरते हो मुर्दा दिमाग तक न देख ले ?
जिस्म छोड़ उड़ गया परिंदा
अब दूर से पास वाले को देखेगा
बडे राज खुलेंगे, एक नया षडयंत्र अब उगेगा
मैं तो उड़ गया हु फिजाओं में
तेरा चक्र तो अब भी चलेगा
दिल की धीमी आंच पर
चढा दिए हैं कुछ सपने
पक जायें तो उतार लेना
ध्यान रखना कि दिल जलता रहे !!!
अखबार सा ताबड़तोड़ पढ़ डाला मुझे
काश में एक मोटा उपन्यास होता
अब जो होगा वो उन्हें भी मालूम और मुझे भी.
हम वो हैं जो आंसू भी फूंक फूंक निकालते हैं
क्या करें उन्होने बनिया जो बना दिया
वरना एक वो आलम था
जब बारिश को देख हम हंसा करते थे
बारिश में बबूल उग आया है
पहले तो इतनी न चुभती थी
शायद उसने अपने उसूल बदल लिए होंगे
वरना पहले तो बड़े अदब से बरसती थी
मिटटी कि गुल्लक लगता है भर गई
जिन सिक्कों को एक एक कर जमा किया
वो नोटों में सिमट जायेंगे
फिर कुछ गोताखोर गंगा में दुबकी लगायेंगे
फिर कुछ और सिक्के मेरे पास आ जायेंगे
धधकती कोलतारी सड़क मेरे पाँव का नाप ले गई,
या खुदा क्या अब जूते भी मेरे ही नाप के मारोगे?
पर वो ही हमें छोड़ चली जाती हैं
क्या हमारे हिस्से में इतनी हवा भी नहीं ?
रोज गूंथता हूँ अपने सपने
पर बडे नमकीन हो चले हैं
मालूम न था आंसुओं में इतना नमक होता है
सोचा था दरिया ऊपर ओढूँ लूँगा
मगर वो भी छलक गया
सर्द हुआ मौसम बहुत
मुआ सूरज भी तो जम गया
राख छानता हूँ कुछ कंकड़ बीनने हैं
उसको मारने का कोई तो हथियार हो
हर तरफ आग लगी है
अब तो आँखों से भी छिड़कने को कुछ न बचा
आते हो और चले जाते हो
सांकल तो खडका दिया करो
थोडी ही सही, कुछ तो खामोशी टूटेगी
कल सूरज मेरे घर चंदा मांगने आया
बोला कुछ आग दे दो, बहुत तंगी है
मैने अपनी हिस्से का दिल तोड़ कर दे दिया
अब तेरे वाले हिस्से से ही जी रहा हूँ
देखना कल कमबख्त दुनिया फूँक डालेगा
सामने से आया और बगल से ही खामोश निकल गया
चलो इतना तो अदब दिखाया की अपनी खुशबू छोड़ गया
इन्ही सड़कों पर तो चले थे साथ हम कभी
अब ये सड़कें तंग हुई तो सड़कों का क्या कसूर ?
रात आई, मेरे चेहरे पर कुछ ठंडी बूँदें गिरा गई
जब आंख खुली तो गर्म आंसू थे गालों पर
कमबख्त को रोना भी ढंग से नहीं आता
भला आंसू भी कभी ठंडे होते हैं?
जिन्दा डूबा तो कैसे?
मुर्दा तैरा तो कैसे ?
क्या सांसें ही इतनी भारी थीं ?
मरते की आंखें अब बंद क्यूँ करते हो
क्या डरते हो मुर्दा दिमाग तक न देख ले ?
जिस्म छोड़ उड़ गया परिंदा
अब दूर से पास वाले को देखेगा
बडे राज खुलेंगे, एक नया षडयंत्र अब उगेगा
मैं तो उड़ गया हु फिजाओं में
तेरा चक्र तो अब भी चलेगा
दिल की धीमी आंच पर
चढा दिए हैं कुछ सपने
पक जायें तो उतार लेना
ध्यान रखना कि दिल जलता रहे !!!
अखबार सा ताबड़तोड़ पढ़ डाला मुझे
काश में एक मोटा उपन्यास होता
अब जो होगा वो उन्हें भी मालूम और मुझे भी.
हम वो हैं जो आंसू भी फूंक फूंक निकालते हैं
क्या करें उन्होने बनिया जो बना दिया
वरना एक वो आलम था
जब बारिश को देख हम हंसा करते थे
बारिश में बबूल उग आया है
पहले तो इतनी न चुभती थी
शायद उसने अपने उसूल बदल लिए होंगे
वरना पहले तो बड़े अदब से बरसती थी
मिटटी कि गुल्लक लगता है भर गई
जिन सिक्कों को एक एक कर जमा किया
वो नोटों में सिमट जायेंगे
फिर कुछ गोताखोर गंगा में दुबकी लगायेंगे
फिर कुछ और सिक्के मेरे पास आ जायेंगे
धधकती कोलतारी सड़क मेरे पाँव का नाप ले गई,
या खुदा क्या अब जूते भी मेरे ही नाप के मारोगे?
Monday, October 26, 2009
संसार का सुनार
हर कोने में गम तलाशता हूँ
हाँ.. मैं गम तराशता हूँ
हर मैं में हम तलाशता हूँ
हाँ मैं इंसान तराशता हूँ
हर कांच में फौलाद ढूँढता हूँ
हर उधाड़ने वाले में बुनकर तलाशता हूँ
हर कोई उधेड़ने में लगा है
हर घर छेदने में लगा है
मैं संगीन नहीं, गुलाब तलाशता हूँ
हाँ मैं गम तराशता हूँ
हजारों दरिया पी गया मैं आज तक
समंदर बन खुद को निखारता हूँ
हाँ मैं गम तराशता हूँ
हाँ.. मैं गम तराशता हूँ
हर मैं में हम तलाशता हूँ
हाँ मैं इंसान तराशता हूँ
हर कांच में फौलाद ढूँढता हूँ
हर उधाड़ने वाले में बुनकर तलाशता हूँ
हर कोई उधेड़ने में लगा है
हर घर छेदने में लगा है
मैं संगीन नहीं, गुलाब तलाशता हूँ
हाँ मैं गम तराशता हूँ
हजारों दरिया पी गया मैं आज तक
समंदर बन खुद को निखारता हूँ
हाँ मैं गम तराशता हूँ
Wednesday, October 21, 2009
रास्तों की राह
इंसान क्या देखता है और क्या पाता है
अजीब विडंबना है, क्या देखूं और क्या पाऊं
यहाँ तो हर बाशिंदे में यमराज ही नज़र आता है
हर कोई काले भैसे पर सवार है
किसी के हाथ भाला तो किसी के पास कटार है
फूल जो लिए फिरे, कहाँ मिलेगा वो
वो तो कहीं अपनी ही दुनिया में खुशगवार है
मन के मनके दोबारा जपने होंगे
कुछ सपने दोबारा बुनने होंगे
राहें कुछ और बदलनी होंगी
वरना खुद को ही राह बनना होगा
यही एक रास्ता है, जिससे न मेरा वास्ता है
अजीब विडंबना है, क्या देखूं और क्या पाऊं
यहाँ तो हर बाशिंदे में यमराज ही नज़र आता है
हर कोई काले भैसे पर सवार है
किसी के हाथ भाला तो किसी के पास कटार है
फूल जो लिए फिरे, कहाँ मिलेगा वो
वो तो कहीं अपनी ही दुनिया में खुशगवार है
मन के मनके दोबारा जपने होंगे
कुछ सपने दोबारा बुनने होंगे
राहें कुछ और बदलनी होंगी
वरना खुद को ही राह बनना होगा
यही एक रास्ता है, जिससे न मेरा वास्ता है
Tuesday, October 20, 2009
बिटिया सी जिंदगी
आज मैं खुद ही अपने बोझ से दब गया
सोखने में इतना मशगूल रहा की निचोड़ना भूल गया
आज जिंदगी निचोडी तो पाया मैं तो अब खाली हूँ
अब क्या सोखुं जिंदगी ये तो बता
तेरा असली रूप तो देख लिया अब कुछ और तो दिखा?
बड़ी मदारी की पोटली लिए फिरती है
हिम्मत है तो मुझे हंसा के दिखा
मैं तो संत हूँ, चिलम पी सो जाऊंगा
तुझे जगाने जिंदगी ये बता कौन आयेगा?
तूने अपने को मुझे दिया तो क्या एहसान किया?
जा दफा हो मैने फिर भी तुझे माफ़ किया
गर मुझे पता होता तू ये गुल खिलाएगी
मेरे शरीर से जोंक सी चिपक जायेगी
तो मैं छड़ी से तेरी खबर लेता, कुछ बड़ी सजा देता
मगर बाप हूँ तेरा, बिटिया को न मारूंगा
तूने तो दुःख दिए मगर मैं सुख दे तुझे संवारुंगा
सोखने में इतना मशगूल रहा की निचोड़ना भूल गया
आज जिंदगी निचोडी तो पाया मैं तो अब खाली हूँ
अब क्या सोखुं जिंदगी ये तो बता
तेरा असली रूप तो देख लिया अब कुछ और तो दिखा?
बड़ी मदारी की पोटली लिए फिरती है
हिम्मत है तो मुझे हंसा के दिखा
मैं तो संत हूँ, चिलम पी सो जाऊंगा
तुझे जगाने जिंदगी ये बता कौन आयेगा?
तूने अपने को मुझे दिया तो क्या एहसान किया?
जा दफा हो मैने फिर भी तुझे माफ़ किया
गर मुझे पता होता तू ये गुल खिलाएगी
मेरे शरीर से जोंक सी चिपक जायेगी
तो मैं छड़ी से तेरी खबर लेता, कुछ बड़ी सजा देता
मगर बाप हूँ तेरा, बिटिया को न मारूंगा
तूने तो दुःख दिए मगर मैं सुख दे तुझे संवारुंगा
झूठा प्रचंड
उम्मीद की डोर पकडे चलो
सपनो को जकडे चलो
मन भारी हो तो बाँट बना कुछ दुःख तोल लो
किसी का कुछ कहा सुनो और किसी से कुछ बोल लो
हर दिन एक अंग मारता है तुम्हारा
उस अंग के मरने से पहले उसकी पोटली भी खोल लो
सपने पूरे हों या रह जायें अधूरे
इस फ़िक्र को छोड़ साधू की मैली चादर ओड लो
पानी है, बहेगा, आंसू हैं, बहेंगे
बस उनकी दिशा किसी और की बजाय अपनी और मोड़ लो
तुम प्रचंड हो, तुम अखंड हो
चाहे झूठ ही सही, इस विचार को अपने से जोड़ लो
सपनो को जकडे चलो
मन भारी हो तो बाँट बना कुछ दुःख तोल लो
किसी का कुछ कहा सुनो और किसी से कुछ बोल लो
हर दिन एक अंग मारता है तुम्हारा
उस अंग के मरने से पहले उसकी पोटली भी खोल लो
सपने पूरे हों या रह जायें अधूरे
इस फ़िक्र को छोड़ साधू की मैली चादर ओड लो
पानी है, बहेगा, आंसू हैं, बहेंगे
बस उनकी दिशा किसी और की बजाय अपनी और मोड़ लो
तुम प्रचंड हो, तुम अखंड हो
चाहे झूठ ही सही, इस विचार को अपने से जोड़ लो
वक़्त की जड़
रोज रोज यादें निचोड़ता हूँ
हर देखे हुए सपने की धूल हटाता हूँ
कभी उन यादों के बाल बहाता, और कभी उन्हे सहलाता हूँ
बच्चे की तरह उन्हे लोरी सुला खुद उनमें सो जाता हूँ
मन की बावली से प्यास नहीं बुझती, तो कुछ आंसू पी लेता हूँ
तेरी उन यादों की अंगुलियाँ पकडे कुछ कदम और चल लेता हूँ
बड़ी शातिर दुनिया है, सुना है साये भी चुरा लेती है
इसीलिए तुझे मन में लिए घूमता हूँ, और सांकल कस देता हूँ
वक़्त और मन बड़े भारी है, इसीलिए कई बार हांफ सा जाता हूँ
कुछ साँसे ज्यादा जिंदगी से उधार मांग आता हूँ
वक़्त का क्या है, उसे तो काटना ही होगा
इसीलिए उसे और बड़ा करने को उसकी जड़ में पानी दे आता हूँ
हर देखे हुए सपने की धूल हटाता हूँ
कभी उन यादों के बाल बहाता, और कभी उन्हे सहलाता हूँ
बच्चे की तरह उन्हे लोरी सुला खुद उनमें सो जाता हूँ
मन की बावली से प्यास नहीं बुझती, तो कुछ आंसू पी लेता हूँ
तेरी उन यादों की अंगुलियाँ पकडे कुछ कदम और चल लेता हूँ
बड़ी शातिर दुनिया है, सुना है साये भी चुरा लेती है
इसीलिए तुझे मन में लिए घूमता हूँ, और सांकल कस देता हूँ
वक़्त और मन बड़े भारी है, इसीलिए कई बार हांफ सा जाता हूँ
कुछ साँसे ज्यादा जिंदगी से उधार मांग आता हूँ
वक़्त का क्या है, उसे तो काटना ही होगा
इसीलिए उसे और बड़ा करने को उसकी जड़ में पानी दे आता हूँ
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